दवा कंपनी ने कराई थी 10 साल पहले दो दर्जन से ज्यादा डॉक्टरों को विदेश यात्रा, नोटिस पाने वालों की लिस्ट में इटारसी के एक डॉक्टर भी शामिल….

इटारसी। मध्यप्रदेश मेडिकल काउंसिल ने 10 साल पहले हुई एक शिकायत के मामले में इटारसी के जैसवानी कार्डियक सेंटर के संचालक और वरिष्ठ डॉक्टर के एल जैसवानी को नोटिस जारी किया है। डॉक्टर जैसवानी के साथ ही मप्र के 19 अन्य डॉक्टरों को नोटिस जारी किया गया है। ये नोटिस सभी डॉक्टरों को तब जारी किया गया जब रायपुर के सामाजिक कार्यकर्ता विकास तिवारी ने मध्यप्रदेश मेडिकल काउंसिल को अपनी शिकायत पर 10 साल बाद भी कार्रवाई नहीं करने पर हाइकोर्ट जाने की चेतावनी दी। इस चेतावनी के बाद मचे हड़कंप के चलते 10 साल से मामला दबाकर बैठी मप्र मेडिकल काउंसिल ने परेशानी में पड़ने से बचने नोटिस देने का कदम उठाया।
यह है मामला
रायपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता विकास तिवारी ने 28 अगस्त 2015 को मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल में एक लिखित शिकायत दर्ज की थी। उन्होंने कहा था कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुल 28 प्राइवेट डॉक्टर 13 जुलाई से 21 जुलाई 2014 तक इटली के खूबसूरत शहरों वेनिस और पोर्टोरोज में घूमने गए थे। यह एक ‘स्पॉन्सर्ड’ यात्रा थी, जिसका पूरा खर्च मुंबई की एक बड़ी फार्मा कंपनी ‘यूएसवी लिमिटेड’ ने उठाया था। विकास तिवारी ने अपनी शिकायत में दावा किया कि यह यात्रा इन डॉक्टरों को इसलिए इनाम के तौर पर दी गई थी, क्योंकि वे मरीजों को इसी कंपनी की दवाएं लिखते थे, जिससे कंपनी को भारी मुनाफा हो रहा था। यह सीधे तौर पर मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन था।
इन डॉक्टरों को मिले नोटिस
मप्र मेडिकल काउंसिल ने इंदौर डॉ. ए.बी. पटेल, डॉ. उमेश मसंद, इटारसी डॉ. कन्हैयालाल जैसवानी, दमोह डॉ. दर्शनमल संगतानी, कटनी डॉ. प्रवीण वैश्य रीवा, डॉ. राजेश सिंघल, सतना डॉ. सुशील कुमार श्रीवास्तव, डॉ. राजेश जैन, नरसिंहपुर डॉ. सचिंद्र मोदी, डॉ. गिरीश चरण दुबे, खरगोन डॉ. रवि महाजन, धार डॉ. विष्णु कुमार पाटीदार, मंदसौर डॉ. विजय शंकर मिश्रा, जबलपुर, डॉ. नरेश कुमार बंसल, डॉ. विजय चावला डॉ. अजय भण्डारी, ग्वालियर डॉ. राजेश्वर सिंह जादौन, शुजालपुर डॉ. एस.एन. गुप्ता, नीमच डॉ. प्रकाश चंद्र पटेल डॉ. रश्मि पटेल को नोटिस जारी किए हैं।

MP में चला नोटिस गेम
मध्यप्रदेश में पिछले 10 साल में केवल नोटिस गेम चला है। शिकायतकर्ता विकास तिवारी के मुताबिक उन्होंने इसी विदेश यात्रा पर गए छत्तीसगढ़ के दो डॉक्टरों की शिकायत छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल को भी की थी। वहां शिकायत पर तत्काल कार्रवाई हुई। काउंसिल ने न केवल डॉक्टरों को नोटिस जारी किया, बल्कि ट्रिप स्पॉन्सर करने वाली फार्मा कंपनी को भी नोटिस जारी हुआ। उसके बाद 4 महीने की जांच के।बाद दोनों डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द कर दिए गए। मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल ने 10 सालों में इन 20 डॉक्टरों को सिर्फ चार नोटिस भेजे हैं।

शिकायतकर्ता की चेतावनी से बढ़ी गर्मी
शिकायतकर्ता के मुताबिक काउंसिल की कार्रवाई इतनी सुस्त थी कि वह उनसे 10 साल में डॉक्टरों के पासपोर्ट, बैंक डिटेल्स और पिछले तीन सालों के बैंक डिटेल तक नहीं ले पाई। मप्र मेडिकल काउंसिल ने खुद जानकारी जुटाने की जगह शिकायतकर्ता विकास तिवारी से ही डॉक्टरों की यात्रा की सारी जानकारी मांग ली। जबकि छत्तीसगढ़ काउंसिल ने खुद कंपनी से जानकारी निकलवा ली थी। विकास तिवारी कहते हैं कि जब 10 साल बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो मैंने काउंसिल को पत्र लिखकर चेतावनी दी कि अगर अब भी कुछ नहीं हुआ तो मैं इस मामले को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करूंगा। मेरी इसी चेतावनी के बाद काउंसिल हरकत में आई और अब अंतिम नोटिस जारी किया गया है।’

10 साल बाद भी अंतिम चेतावनी

शिकायतकर्ता की हाईकोर्ट की चेतावनी के बाद एथिक्स कम डिसीप्लीनरी कमेटी ने 7 अगस्त, 2025 को इस मामले की सुनवाई की। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में माना कि डॉक्टरों को पासपोर्ट, आयकर रिटर्न, ऑडिट रिपोर्ट और बैंक ट्रांजैक्शन डिटेल जैसे जरूरी दस्तावेज जमा करने के लिए चार बार पत्र भेजे गए, लेकिन उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी। अब काउंसिल ने इन डॉक्टरों को अंतिम अवसर देते हुए आदेश दिया है कि वे इस पत्र के मिलने के 15 दिनों के भीतर मांगी गई जानकारी प्रस्तुत करें। जानकारी जमा नहीं होने पर उनके खिलाफ अंतिम आदेश जारी कर दिया जाएगा। काउंसिल को अब तक सिर्फ 8 डॉक्टरों की यात्रा टिकट और 16 डॉक्टरों के पासपोर्ट ही मिल पाए हैं। तीन डॉक्टर तो ऐसे हैं, जिनका सही पता तक काउंसिल 10 साल में नहीं ढूंढ पाई। जबकि शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने 50 रुपए के एफिडेविट के साथ सभी दस्तावेज और जानकारी जमा की थी।

फार्मा कंपनी पर कार्रवाई की मांग

शिकायतकर्ता विकास तिवारी ने कहा कि इस तरह के मामलों में सिर्फ डॉक्टरों को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है। फार्मा कंपनियों पर भी सरकार के यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मासूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज 2024 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसके तहत अनैतिक मार्केटिंग करने वाली कंपनी का लाइसेंस निलंबित किया जा सकता है। ऐसी फार्मा कंपनियों का नाम सार्वजनिक कर उसे ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है। विकास तिवारी के मुताबिक यह मामला स्वास्थ्य सेवा के उस काले पक्ष को सामने लाता है, जहां मरीजों की सेहत और जेब पर डॉक्टरों और दवा कंपनियों का गठजोड़ डाका डाल रहा है।

अधिकारियों ने काटी कन्नी, नहीं दिया जवाब

इस मामले में जिम्मेदार संस्था मध्यप्रदेश मेडिकल काउंसिल की रजिस्ट्रार डॉ. दीप्ति चौरसिया ने कहा कि एक साल पहले ही उन्होंने रजिस्ट्रार का काम संभाला है। इन शिकायतों की सुनवाई एथिक्स कमेटी कर रही है, जिसकी चेयरमैन मध्य प्रदेश की डायरेक्टर ऑफ मेडिकल एजुकेशन डॉ. अरुणा कुमार है। शिकायतों पर सुनवाई करने वाली मेडिकल एथिक्स कमेटी की चेयरपर्सन और डायरेक्टर ऑफ मेडिकल एजुकेशन अरुणा कुमार ने इस मामले पर बात करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘शिकायत मेडिकल काउंसिल में हुई है, आप उनसे बात करें। मैंने तो अभी इस शिकायत की फाइल ही नहीं देखी।

इनका कहना है
रायपुर के कोई विकास तिवारी ने मप्र और छत्तीसगढ़ के करीब दो दर्जन डॉक्टरों को लेकर मेडिकल काउंसिल में शिकायत की थी। हमने मेडिकल काउंसिल से शिकायतकर्ता द्वारा दिए गए दस्तावेज मांगे थे जो काउंसिल ने हमे नहीं दिए। उन्होंने बिना तथ्यों कें शिकायत की है और ना उनके पास कोई दस्तावेज हैं। छत्तीसगढ़ में जिन डॉक्टरों की शिकायत की थी उसमें भी मामला हाइकोर्ट तक गया था जिसे वहां से खारिज कर दिया गया क्योंकि कोई दस्तावेज ही नहीं थे। फार्मा कंपनी ने मेडिकल काउंसिल को पत्र भी दिया है कि हमने इस तरह की कोई यात्रा स्पोंसर नहीं कराई है। हमे अभी जो नोटिस आया है जिसमें कुछ दस्तावेज मांगे गए हैं हमने अपने अधिवक्ता के माध्यम से जबलपुर हाईकोर्ट में कुछ बातें रखी हैं।

केएल जैसवानी, संचालक जैसवानी हॉस्पिटल इटारसी

हमने जो शिकायत की है उसमें पूरे दस्तावेज के साथ शपथपत्र भी दिया है। शपथपत्र झूठा देने का तो सवाल ही पैदा नहीं हो सकता क्योंकि वो एक आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है। मेडिकल काउंसिल के पास हर वो जरूरी दस्तावेज हमने उपलब्ध कराया है जिसके आधार पर हमारी शिकायत दर्ज हुई और नोटिस जारी हुए। अगर कोई पुख्ता सबूत और दस्तावेज नहीं होते तो मेडिकल काउंसिल नोटिस क्यों जारी करती। हमने पूरे मामले को लेकर दिल्ली मेडिकल काउंसिल में भी शिकायत की है। हम अभी इंतज़ार कर रहे है कि मप्र मेडिकल काउंसिल क्या कर रही है इसके बाद आवश्यकता पड़ी तो हम हाइकोर्ट में भी जाएंगे।
विकास तिवारी, शिकायतकर्ता रायपुर